एकता दिवस मनाएं या बलिदान दिवस
एकता दिवस मनाएं या बलिदान दिवस
खबरों में वहीं जो सत्ता में है। वे शक्तिशाली हैं। उन्हें अपने हिसाब से जनभीड़ को मोड़ना आता है। वे ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ के नाम पर भीड़ को दौड़ा रहे हैं। कह रहे हैं ‘रन फॉर यूनिटी’। कहते हैं कि दौड़ेंगे तो देश में एकता आएगी। देशवासी तो दौड़ ही रहे हैं। इनके रोज-रोज दौड़ने से क्या फर्क पड़ता है। 31 अक्टूबर को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हरी झंड़ी दिखाए, फिर दौड़ों तो पूरे दिन मीडिया की सुर्खियों में रहेंगे। बता दें कि 31 अक्टूबर का नामांकरण जबसे मोदी सरकार बनी है तबसे ‘एकता दिवस’ हो गया है। इस पावन दिन यानी 31 अक्टूबर, 1875 को लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म हुआ था।
लौह पुरुष से ध्यान आया कि हम भारतवासियों के पास एक लौह महिला (आयरन लेडी) भी हुआ करती थी। वहीं जिन्हें देश की पहली महिला प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त है, ‘इंदिरा गांधी’। आज ही के दिन 1984 में उनके अंगरक्षकों ने उन्हें गोलियों से भून दिया था। जब देश में संययुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार थी तो इस दिन को ‘बलिदान दिवस’ के रूप में मनाया जाता था।
प्रधानमंत्री मोदी लौह पुरुष को तो याद करते हैं परंतु आयरन लेडी को श्रद्धांजली केवल ट्वीट करके दे दिया। ये बात और है कि इंदिरा काल में देश पर थोपित आपातकाल को लोकतंत्र का काला अध्याय माना जाता है। अपनी हुकुमत को बचाने के लिए इंदिरा गांधी ने यह अप्रत्याशित फैसला रातों-रात ले लिया था। फिर भी आजाद भारत की सुरक्षा को लेकर इंदिरा गांधी ने जो कदम उठाए थे उस तरह के कदम उठाने की अपेक्षा देश को अपने 56 इंच के सीने वाले प्रधानमंत्री से भी है। सरदार पटेल ने अगर अंग्रेजों के गुलामी से पीड़ित, शोषित और बिखरे भारत के एकीकरण में अद्भुत योगदान दिया था तो इंदिरा गांधी ने गरीबी, भूखमरी से पीड़ित अशिक्षित जनता में गौरव की भावना जगाने में अहम भूमिका निभाई थी।
देश की सुरक्षा सर्वोपरी
भारतीय राजनीति में कुछेक नेता ऐसे हैं जिन्हें देश किसी भी सूरत में भूला नहीं सकता। सरदार पटेल और इंदिरा गांधी के चरित्र को पक्षपात और राजनीति से हटकर देखना होगा। इतिहास भी इनके द्वारा स्थापित मूल्यों की अनदेखी नहीं कर सकता। देशहित में क्या कदम उठाने जरूरी हैं और कैसे उठाना है, वर्तमान नेताओं को इस तथ्य को उनसे समझना चाहिए। लेकिन इस तथ्य को समझने की जरूरत आज के नेता नहीं समझते। वे अपने महानायकों की प्रतिमा बनाकर और उनके नाम पर देश के रास्तों और चौराहों को करके ही अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ले रहे हैं। सरदार पटेल और इंदिरा गांधी को इसलिए ‘लौह’ संज्ञा से नहीं नवाजा गया था कि उनके अनुयायी उनकी लोहे की प्रतिमा बनाए बल्कि इसलिए उन्हें लौह पुरुष और महिला माना गया था क्योंकि उन्होंने लौह के समान ठोस निर्णय लिए थे।
2,979 करोड़ी एकता की प्रतीमा
प्रधानमंत्री मोदी मानते हैं कि अगर लौह पुरुष की लोहे कि प्रतिमा विश्व की सभी प्रतिमाओं से ऊंची बनवा देंगे तो पूरा भारत एकजुट हो जाएगा। इसलिए उन्होंने ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ बनवाने का निर्णय लिया। उनका मानना है कि इससे देश की आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित होगी। इस स्टैच्यू के निर्माण में 2,979 करोड़ रुपए की लागत आएगी और उसके निर्माण का जिम्मा देश की अग्रणी कंपनी ‘एल एंड टी’ के ऊपर है।
दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के नेताओं को समझना होगा कि सरकारें जनता के लिए होती हैं। सरदार पटेल या इंदिरा गांधी दोनों यहीं चाहते थे कि देश सुरक्षा पर कहीं से कोई आंच ना आए। उन दोनों ने इसके लिए हर संभव कदम उठाए। लेकिन आज हमारी सुरक्षा ताक पर है। हमारे सुरक्षा जवान सुरक्षित नहीं। कभी कोई जवान सीमा पर घुसपैठियों का शिकार हो रहा है तो कभी वे हवाई हादसे में शहीद हो जा रहे हैं। सुरक्षा डील और सुरक्षा नीतियों दोनों में खामियां ही इसके लिए जिम्मेवार हैं। विश्व में सबसे ऊंची प्रतिमा बनवाने से पहले प्रधानमंत्री मोदी से अपील है कि देश के सुरक्षा घेरे को मजबूत करें ताकि कोई घुसपैठियां या माओवादी हमारी सेना को या फिर जनता को नुकसान ना पहुंचा पाए।
गांधी-नेहरू परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कांग्रेस परिवार और सदस्यों को भी अपने अतीत को देखने-समझने की जरूरत है। इंदिरा गांधी के समर्थकों को यह याद होगा कि कैसे उन्होंने लगभग मर चुकी कांग्रेस में जान फूंकी थी। आज की कांग्रेस को भी संजीवनी की जरूरत है। क्योंकि लोकतांत्रिक देश को एक मजबूत विपक्ष चाहिए। राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी अपने समर्थकों के साथ चाहें जितना हो ट्विटर-ट्विटर खेल लें। जनता अपने महानायकों को तो जरूर याद रखती है। लेकिन राजनैतिक नौटंकी करने वालों को कहीं सोशल मीडिया के भरोसे ही ना छोड़ दे। वैसी परिस्थिति में सोशल मीडिया पर ही मनाए जाएंगे ‘एकता दिवस’ और ‘बलिदान दिवस।’
Mayawati ne to pura UP Bhat hi Diya hai, ab ye desh ko bharenge murtiyan banwa kr