बात बापू के नजरबंदी के दिनों की
बात बापू के नजरबंदी के दिनों की
कहने, सुनने और देखने को तो कई बाते इतिहास हैं। परंतु वर्तमान से इनका इतना गहरा नाता हैं कि हम नजर उठाते इसे प्रत्यक्ष पाते हैं। यूं तो महात्मा गांधी ने कई दशक पहले कहा था कि, “बूरा मत देखो, बूरा मत बोलो और बूरा मत सुनो”, उनकी कही आज भी प्रासंगिक है। महात्मा गांधी हमारी विचारधारा की बूनियाद हैं। आज भी हमारा देश में जब कोई नीति बनाने या निर्णय लेने की बात होती है तो बापू के अहिंसावादी सिद्धांतों पर ही अमल किया जाता है।
दो अक्टूबर को पूरे देश में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती मनाई जाती है। यूएनओ ने इस तिथि को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ घोषित किया है। इस दिन बापू से जुड़ी कई बातें लोग और मीडिया अपनी-अपनी तरह से सुनाते हैं। इस मौके पर बात उस जगह की भी हो जो न सिर्फ बापू के जीवन में बल्कि इतिहास में भी अपना एक अलग महत्व रखता है। वह जगह है, पुणे शहर। यूं तो महात्मा गांधी को साल 1930 से 1940 के दौरान कई बार अंग्रेजो ने गिरफ्तार कर पुणे की यरवदा जेल में रखा। जिसमें कई बार उनके साथी जवाहरलाल नेहरु, नेताजी सुभाष बोस, बाल गंगाधर तिलक और वीर सावरकर समेत कई बड़े नेता रहे। यरवदा जेल के अलावे भी एक खास जगह है जहां बापू को अंग्रेजी सरकार ने नजरबंद रखा था, वह है पुणे का ‘आगा खान पैलेस।’ इस पैलेस से महात्मा गांधी की कड़वी यादें जुड़ी हैं। हालांकि वर्तमान दौर में यह महल पर्यटन स्थल के रूप में मशहूर हैं।
पैलेस का इतिहास
हमारे देश में यूं तो कई महल और पैलेस हैं जिन्हें पर्यटक अपनी लिस्ट में ऊपर रखते हैं। पुणे के यरवदा मे स्थित इस पैलेस का निर्माण 1882 में सुल्तान मुहम्मद शाह आगा खान द्वितीय ने करवाया था। जिसे 1969 में आगा खां चतुर्थ ने भारत सरकार को दान में दे दिया। इस पैलेस की खासियत यह है कि इसने हिन्दूस्तान की आजादी के संघर्ष को काफी करीब से देखा और समझा है।
कहते हैं कि 19 एकड़ में फैले इस पैलेस का स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से गहरा नाता रहा है। बात 9 अगस्त, 1942 को ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान की है। अंग्रेजों ने महात्मा गांधी और कांग्रेस कार्यकारिणी समिति के सभी सदस्यों को मुंबई में गिरफ्तार कर लिया था। गिरफ्तारी के बाद महात्मा गांधी को पुणे के इसी आगा खान पैलेस में दो साल तक नजर बंद रखा गया था।
इन दो सालों में बापू के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए। बापू के लिए ये दौर बहुत तकलीफ भरा था। उनके दो अत्यंत करीबी उनसे हमेशा के लिए दूर हो गए थे। बापू के नजरबंद रहते हुए इसी पैलेस में उनके 50 साल पुराने सचिव महादेव देसाई को दिल का दौरा पड़ा और 15 अगस्त, 1942 को वे आगा खान पैलेस में बापू को छोड़ कर कभी न लौटने वाले सफर पर चले गए। बापू अभी इस सदमें से ऊबर ही रहे थे कि उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी बीमार रहने लगी। बा ने 22 फरवरी, 1944 को अंतिम सांस ली। गांधीजी भगवद गीता का अध्ययन करते थे। जानकार मानते हैं कि उनके जीवन पर संभवत: इसका सबसे अधिक प्रभाव था। कहते हैं कि गीता में उल्लेखित संस्कृत के दो शब्दों को उन्होंने आत्मसाध किया था। एक ‘अपरिग्रह’ (त्याग), जिसका मतलब है मनुष्य को अपने आध्यात्मिक जीवन को बाधित करने वाली भौतिक वस्तुओं का त्याग कर देना चाहिए और धन-संपत्ति के बंधनों से मुक्त हो जाना चाहिए। दूसरा ‘सम्भाव’(समान भाव), जिसने उन्हें दुख-सुख, हार-जीत, सबमें अडिग रहना तथा सफलता की आशा और असफलता के भय के बिना काम करना सिखाया। तभी तो वह सतत स्वतंत्रता आंदोलन के संचालन में एकरत रहे। महात्मा गांधी के साथ भारत कोकिला सरोजनी नायडू को भी यहां नजरबंद रखा गया था। महात्मा गांधी नजरबंद रहते हुए इसी महल से ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की आगे की रणनीति पर काम करते थे।
बहरहाल इस पैलेस को संग्राहलय के रूप में विकसित कर दिया गया है। यहां कस्तुरबा गांधी की मृत्यु के बाद उनकी समाधी भी बनाई गई। संग्रहालय में बापू से जुड़ी बहुत सी सामग्रियां रखी गई हैं। उनके व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुएं जैसे उनकी चप्पलें, चरखा, बर्तन, किताबें, कुछ कपड़े और चश्मा यहां रखें गए हैं। साथ ही इस संग्रहालय में बापू के जीवन से जुड़े चित्रों की एक फोटो गैलरी भी स्थापित है। इसके अलावा इस महल के बगीचे में बाबू के सचिव महादेव देसाई की समाधि स्थल बनाई गई है।
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