जकड़ी जजीरों को तोड़ने की जरूरत

तेजी से बढ़ती अर्थ-व्यवस्था के साथ-साथ भारत में सामाजिक और राजनैतिक बदलाव भी हो रहे हैं। पिछले दो दशकों में देश की आर्थिकी ने अपनी अलग दिशा तय की है। नई अर्थ-व्यवस्था में एक बड़े मध्यम वर्ग का निर्माण भी शामिल है। इसे आंकड़ो की नजर से देखें तो 1993 में देश की 45 फीसदी अबादी गरीबी रेखा के नीचे थी जो कि 2011 में घटकर 21 फीसदी हो गई। आर्थिक विकास के अलावा देश में समाज के नीचले तबके के जीवन में सुधार के लिए कई योजनाएं एवं परियोजनाएं लागू किए गए हैं। इस व्यवस्था को ठीक करने के लिए श्रमिक नियमों के विनिमियन के साथ-साथ सामाजिक जीवन स्तर में भी सुधार के लिए कदम बढ़ाए जा रहे हैं। लेकिन अभी भी हमें जिस चुनौति से लोहा लेना है वह है ‘बंधुआ मजदूरी।’ वर्ष 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने इस बीमारी को दूर करने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) को सौंपा। बंधुआ मजदूरी को पूरी तरह से खत्म करने के लिए लोगों में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से एनएचआरसी ने पूरे देश में सेमिनार एवं कार्यशाला आयोजित करने का निर्णय लिया। साल 2017 की शुरूआत में राजधानी दिल्ली में राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया। 14 फरवरी को दिल्ली में हुए सेमिनार में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एचएल दत्तू और केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राय रखी थी। जस्टिस दत्तू का कहना था कि तमाम स्कीमों, नियम-कायदों के बावजूद बंधुआ मजदूरी के खात्मे के लिए अब तक कोई ठोस काम नहीं हुआ है। वहीं केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने कहा था कि सरकार ने बहुत काम किया है। लेकिन जब तक लोगों की सामंती सोच नहीं बदलती इस बुराई का पूरी तरह समाप्त होना मुश्किल है।
एनएचआरसी की सेमिनारों की कड़ी में बीते 6 अक्टूबर को महाराष्ट्र के पुणे शहर में सेमिनार एवं कार्यशाला आयोजित किया गया। जिसकी अध्यक्षता एनएचआरसी के सदस्य जस्टीस डी मुरुगेसन ने किया। जस्टीस डी मुरुगेसन ने सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा कि “देश को बंधुआ मजदूरी से आजादी दिलाने के लिए वर्ष 1976 में बंधुआ श्रम तंत्र (उन्मूलन) अधिनियम पारित किया गया था। लेकिन अफसोस कि हमें 2017 में बंधुआ मजदूरों के उन्मूलन के लिए सेमिनार आयोजित करना पड़ रहा है।” मुरुगेसन ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि “उत्पीड़ित मजदूरों को न्याय दिलाने के लिए गुमनाम नियोक्ताओं के खिलाफ मुकदमा चलाने की जरूरत है। मजदूरों को बंधुआ बनाने वालों की पहचान कर उनपर उपयुक्त कार्रवाई होनी चाहिए। हमारा अभी तक का अनुभव यह रहा है कि मजदूरों को रिहा करा दिया जाता है और नियोक्ताओं महज औपचारिकता भर हिरासत में लिया जाता है और कुछ घंटों में वे रिहा हो जाते हैं।” बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास से जुड़ी समस्याओं पर भी मुरुगेसन ने ध्यानार्कषित किया।

दरअसल बंधुआ मजदूरों का मामला बेहद चुनौतिपूर्ण है। यह बीमारी बहुत पुरानी है। बंधुआ मजदूर प्रथा भारत की ज्वलंत समस्याओं में से एक है। 1975 में तत्कालिक राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने अध्यादेश के जरिए बंधुआ मजदूरी पर प्रतिबंध लगा दिया था। भारत सरकार ने 30 अक्यूबर, 1980 को एक बयान भी जारी किया था। उस बयान में बताया गया था कि अब तक 1,20,500 बमधुआ मजदूरों को आजाद करवाया जा चुका है। लेकिन इन आजाद मजदूरों के सामने दूसरी समस्या आ खड़ी होती है। आजाद मजदूरों को कोई जमीन मालिक अपने यहां काम नहीं देता। मजबूरन उन्हें अपना पैतृक गांव छोड़ना पड़ता है। बंधुआ मजदूरों पर शोध करने वालों का कहना है कि सिर्फ आजाद करवा देने से सरकार का काम खत्म नहीं हो जाता। बंधुआ मजदूरों का इतिहास देखें तो पता चलता है कि वे ठेका-मजदूरों के रूप में नए सिरे से बंधुआ बन जाते हैं।
हमें बंधुआ मजदूरी पर विस्तार में समझना और विचार करना होगा। हम जानते हैं कि मजदूरों का सबसे अधिक शोषण खेती और कृषि के क्षेत्र में होता है। परंपरागत रूप से भू-मालिक जाति के लोग है और निम्न तबके के लोगों के पास खेती के लिये बहुत कम या बिल्कुल भी भूमि नहीं होती है। उन्हें मजबूरी में दूसरों के खेतों में काम करना पड़ता है। हालांकि केरल जैसे राज्यों में भूमि सुधार कानून लागू हो जाने के कारण बंधुआ मजदूरी का उन्मूलन हो गया है।लेकिन दूसरे राज्यों में जैसे गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडू और कर्नाटक में परंपरागत रुप से जमींदारी, साहूकारी से जुड़े लोगों के पास ही जमीन का बड़ा भाग है। जिस वजह से यह प्रथा यहां आज भी प्रचलन में है।

ऐसा नहीं है कि बंधुआ मजदूरी केवल कृषि के ही क्षेत्र में और गांवों में ही प्रचलित है। इसका नया स्वरूप शहरों में देखने को मिल रहा है। बड़ी संख्या में मानव तस्करी हो रही है। महिलाएं और बच्चों को देह व्यापार में लगाया जा रहा है। आजकल अंग-व्यापार का धंधा भी जोरो पर है। शहरों में अमानवीय वातावरण में बंधुआ मजदूरों से काम करवाया जाता है। खनन का काम हो या माचिस निर्माण का, ईंट के भट्टे में काम कर रहे हो या होटलों में नौकर का, बंधुआ मजदूरी हर जगह व्यापक रुप से फैली हुई है। शहरों में प्रवासी मजदूरों को अपने काम का नाममात्र वेतन मिलता है। कुछ मजदूरों को तो यह वेतन भी मुनासिब नहीं होता, क्योंकि उनके काम का पगार उनके एजेंट ले जाते हैं। ‘ग्लोबल सालवरी इंडेक्स’ (जीएसआई) ने इसे आधुनिक गुलामी का नाम दिया है। जीएसआई के 2016 के सर्वेक्षण के अनुसार भारत में आधुनिक गुलामी के शिकार 18,354,700 लोग हैं। इस अमानवीय व्यवस्था में बच्चों को भी शोषित किया जाता है। खासकर छोटे स्तर की कंपनियों जैसे पटाखे, माचिस, टेक्सटाइल, चमड़े से वस्तु निर्माण करने वाली कंपनियों में बच्चों को काम पर लगाया जाता है। इसके अलावे उन्हें चाय की दुकानों, होटलों, ढाबों आदि में भी सुबह से लेकर शाम तक काम करने के लिए मजबूर किया जाता है।
हालांकि भारत में बंधुआ मजदूरी को समाप्त करने के लिए संवैधानिक और अन्य प्रावधान किए जा रहे हैं। बंधुआ मजदूरी के उन्मूलन में सुप्रीम कोर्ट की अहम भूमिका रही है। कानूनी प्रावधानों के अनुचित या गैर कार्यान्वयन के कई जनहित याचिकों पर सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक घोषणाएं की हैं। ऐसा ही एक मामला भारतीय संघ (1984 एससी) बनाम केंद्रीय बंधुआ मुक्ति मोर्चा का था। इस मोर्चा ने एक जनहित याचिका में हरियाणा में बहुत बड़ी संख्या में बंधुआ मजदूरों पत्थर की खदानों में अमानवीय तरीके से काम करवाया जा रहा था। राज्य के अधिकारी मजदूरों को बिना किसी चिकित्सा सुविधा, सुरक्षा नियमों और बहुत कम वेतन पर काम करवा रहे थे। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने इन मजदूरों को बंधुआगीरी से रिहाई करने के साथ ही इनके पुनर्वास का भी आदेश दिया था। बंधुआ मजदूरों की आजादी की लड़ाई में इसे ऐतिहासिक मामलों में से एक माना जाता है। निर्णय सुनाते हुए जस्टिस भगवती ने कहा था, “बंधुआ मजदूरी नई समानतावादी सामाजिक-आर्थिक समाज के साथ बिल्कुल असंगत है। जिसे हमने गैर-प्राधिकृत व्यापारी बनाने का वादा किया है। यह न केवल बुनियादी मानवीय गरिमाओं का अपमान ही है बल्कि संवैधानिक मूल्यों का सकल और विद्रोही उल्लंघन का भी है।”
एक और मामले नीरजा चौधरी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (एआईआर 1984 एससी) में पुनर्वास के समय, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बंधुआ मजदूरों को पहचान कर रिहा किया जाए और उनकी रिहाई के साथ ही उनके पुनर्वास के व्यवस्थित प्रबंध किए जाए। सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) को बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास और बंधुआ श्रम प्रणाली के प्रावधान (उन्मूलन) अधिनियम 1976 के संबंध में न्यायालय के निर्देशों के कार्यान्वयन की निगरानी करने के लिए कहा। एनएचआरसी इसके तहत जागरूकता फैलाने के समय-समय पर देश के विभिन्न राज्यों में सेमिनार एवं कार्यशालाओं का आयोजन करती रहती है। जिसका परिणाम है बंधुआ मजदूरी की प्रणाली की दर में गिरावट आ रही है। लेकिन समाज से इसका उन्मूलन पूरी तरह से नहीं हुआ है। हालांकि सरकार इस बुराई को खत्म करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है। वर्ष 2016 में वित्तीय सहायता के लिए बंधुआ श्रम योजना को संशोधित किया गया था। इसके अनुसार, केंद्र ने बंधुआ मजदूरों की श्रेणी के आधार पर पीड़ितों को मुवावजा राशी बढ़ा कर 1-3 लाख रुपए कर दिया है। पहले यह राशी महज 20,000 रुपए थी। बंधुआ मजदूर पुनर्वास स्कीम के तहत अब वित्तीय सहायता वयस्क पुरुषों, बच्चों/महिलाओं तथा यौन शोषित किन्नरों/बच्चों/महिलाओं के मामले में क्रमश: एक लाख, दो लाख तथा तीन लाख रुपए कर दिया गया है। हालांकि यह मुआवजा पीड़ित को तभी मिलेगा जब मुकदमें का फैसला आ जाएगा। इसके अलावा बंधुआ मजदूरी सर्वेक्षण सहायता राशी को बढ़ाकर साढ़े चार लाख रुपए कर दिया गया है। हर जिले में 10 लाख रुपए का बंधुआ मजदूर पुनर्वास कोष स्थापित करने का निर्देश दिया गया है ताकि वहां से यह राशी सीधे लाभार्थी के खाते में डाला जा सके।
पुणे में आयोजित सेमिनार में श्रम और रोजगार मंत्रालय के अंडर-सेक्रेटरी ए के सिंह ने कहा, “प्रवर्तन अधिकारी मजदूरों को छुड़ाने और उन्हें पुनर्वासित करने का काम कर रहे हैं। लेकिन हमें जिस तत्परता से करना चाहिए उतना हो नहीं पा रहा है।” बंधुआ उन्मूलन कानून के अनुसार जिला मजिस्ट्रेटों को तत्काल राहत के रूप में बचाए गए बंधुआ मजदूरों को 20,000 रुपए का भुगतान करने होगें। इसके लिए, सरकार ने प्रत्येक जिला मैजिस्ट्रेट को 10 लाख रुपए का अलग से कोष बनाने की सिफारिश की थी। सेमिनार में आएं प्रवक्ताओं से जानकारी मिली कि अभी तक केवल दो-तीन राज्यों में ही इस कोष को बनाया गया है। सेमिनार में जस्टीश डी मुरुगेसन ने कहा, ” बंधुआ मजदूरों को आजाद कराने और उन्हें पुनर्वासित करने में हो रही देरी का मतलब है उनके साथ बहुत बड़ा अन्याय हो रहा है।” 31 मार्च, 2017 सरकारी खाते से बंधुआ मजदूरो के हक में तीन लाख से थोड़ा अधिक मुवावजा जारी किया गया है। यह औसतन लगभग 5,704 रुपए होता है। यह दिखाता है कि बंधुआ मजदूरों के उन्मूलन एवं पुनर्वास नियम को यथोचित रूप से लागू नहीं किया जा रहा है। जस्टीस डी मुरुगेसन ने उपस्थित लोगों से अपील किया कि वे बंधुआ मजदूरों शोषण के खिलाफ आवाज उठाएं और जंजीरों में जकड़े लोगों को आजादी दिलाएं।
Recent Comments